Thursday, May 31, 2012

लिखना नहीं, दिखना बन्द हो गया था

नमस्कार! गुरुवार की हलचल यूं तो संगीता आंटी की होती है लेकिन फिलहाल कुछ समय तक वो व्यस्त हैं इसलिए हाजिर हूँ मैं ही एक बार फिर कुछ चुने हुए लिंक्स के साथ --


ये  '' उदासी ''......
क्यूँ  अपने रंग में रंग कर मुझे......
उदास.....बहुत  उदास... कर जाती है........???

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बेपरवाह होकर देखो कभी जिंदगी को

झटक दो उन चिंताओं को
सिर को हिलाकर कभी
मुस्‍करा दो कभी यूँ ही बेतकल्‍लुफ़ हो

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कूकती कोयल के स्वर से गूँजती अमराइयों में
प्यार के थे गीत गाती, गर्मियों की वो दुपहरी

बिन तेरे उफ़! किस कदर थी जानलेवा यार लम्बी
और सन्नाटे में डूबी, गर्मियों की वो दुपहरी

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जेठ हुआ मेहमान

चढी धूप तपने लगा भडभूजे का भाड ।
चित्त चना सा भुन रहा,तन हो रहा तिहाड ।

दिन भर चूल्हे पर तपे धरती तवा समान ।

रोटी सेके दुपहरी,जेठ हुआ मेहमान ।

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भावनाओं में बहोगे तो पागलों सा लिखोगे....

आज  यहाँ  हो रही है बारिश हल्की हल्की, पर खाली दिल भारी सा है,
सोच रहा था थम जाती बूंदें घूम आता कहीं से पर बादलों का बरसना जारी है..

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मेरी नजरें हो रही धुंधली साफ़ तस्वीर बना,
मेरी नजरों से उनके चेहरे की चमक ले आ!

दिल का शोला जख्मो की आग ठंडी है,
उनके गर्म आहों की तू दहक ले आ


♦♦♦♦♦

मै और वो ...

मै गीत पुराने गाती थी 
वो मुझ पर गीत बनाता था 
मै बच्चो के संग खेलती थी 
वो टोलियाँ ढून्ढ के लाता था 
मै तितली सी इठलाती थी 
वो मुझे देख मुस्काता था 

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क्राइम पेट्रोल

बच्चे कितना दर्द सह रहे हैं | किसी का बाप उन्हें प्रताड़ित कर रहा है तो कुछ शिक्षकों का जुल्म, भारत देश का ऐसा कितना बड़ा भाग है जहाँ बच्चों को पैदा करते ही या तो भीख मांग कर कमाई करने के लिए छोड़ दिया जाता है या कहीं कवाड़ी की दूकान में कबाड़ा बीनने के लिए

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अभि‍नय की तरह

हम तड़पते हैं और चीख़ नहीं पाते !
कोई भी कर सकता है हमारी मदद 
पर,  हम,  पु का र ते   नहीं !

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टिटलागढ़ की एक रात

उधर से बॉस की खरखराती हुई आवाज आई , " राजेश  , तुम आज के आज ही टिटलागढ़ में जाकर वहां के स्टील प्लांट में परचेस ऑफिसर से मिलो . मैं फैक्स  भेज रहा हूँ सारी डिटेल्स उसी में है  . "
मैंने मिमियाते हुए कहा , " सर बहुत काम है , अगले हफ्ते चले जाऊं ? 

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सुबह की चुस्की


आगे बढ़
और नए रास्तो से
आज कर पहचान
लिख गीत ऐसे
कि कल पंछी
उसी गीत से
करे सुबह का आव्हान

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समय : क्या है समय ?


  • समय क्या है ?
  • समय का निर्माण कैसे होता है ?
  • गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से समय धीमा कैसे हो जाता है ?
  • गति मे समय धीमा क्यों हो जाता है ?
  • क्या समय एक आयाम है ?
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दूसरा बनवास

धरम क्या उनका है, क्या ज़ात है, ये जानता कौन?
घर न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन,

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अभिषेक ठाकुर की कवितायेँ

खुद को भिगो देने के लिए
या एक बिना रील के कैमरे
से ली गयी कुछ अकेली तसवीरें
और अंत में बच जाएगा
सिर्फ एक मौन
टेबल लैम्प की
आवाज की तरह

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लिखना नहीं, दिखना बन्द हो गया था

हमारे फेसबुक से मुँह मोड़ लेने के कारण वे न चाहते हुये भी हमसे मुँह मोड़ चुके थे। समझ मे तब स्पष्ट आया कि फेसबुक अकेले ही १०० के लगभग पाठक निगल चुका है।पर इस बार ट्विटर की चूँ चूँ भी साथ में रहेगी हमारे। जब दिखना है तो ढंग से और हर रंग से दिखा जायेगा।


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मानवीय संवेदनाओं के निम्नतर स्तर की उपज हैं ये घटनाएँ ......और इन्हें उच्चतर बनने की क्रिया एक सतत प्रक्रिया है ...........इसके लिए प्रयास होता रहे चाहे वो लिखने और पढ़ने  से ही क्यों ना हो ..तो लगा ये ज्यादा अच्छा  है .... कुछ ना होने से बहुत  बेहतर ...........

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That broken glass 

scattered all around me
hurting my fingers 
as I bend to pick up the shards.

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 और ये रहा आज का गाना ---


 इसी के साथ दीजिये इजाजत;मिलेंगे कल फिर.....

यशवन्त माथुर 


Wednesday, May 30, 2012

एक समय जो गुज़र जाने को है ...

आप सभी को '' सदा '' का नमस्‍कार ...

आज की हलचल का शीर्षक 'एक समय जो गुज़र जाने को है' हर बात को जैसे पकड़ता हुआ सा लग रहा है.. किसी के परीक्षा परिणाम घोषित हुए हैं तो उसके मन में एक उल्‍लास है एक ख्‍़वाब साक़ार हुआ मेहनत का सफ़ल होना खुशी का ठिकाना नहीं ... इस बार के नतीजों में फिर बेटियों ने बाज़ी मारी ... अभी किसी को प्रतीक्षा है परिणाम की ... इसकी घोषणा मात्र से भूख-प्‍यास दोनो ख़तम ... क्‍या होगा - जाने क्‍या होगा की उत्‍सुकता से बेचैन मन ... इसी क्रम में है मुझे भी जानना कि आज की यह संक्षिप्‍त हलचल आपको पसंद आएगी या फिर ... चलें आज के लिंक्‍स पर ...

ओढ़ लूँ एक नई शक्शियत..
बदल जाऊँ इन उपकरणों की दुनिया में..
बन एक नया उपकरण...

कभी समय से पहले
कभी समय के बाद ...
जब तक मैं हूँ
मैं खुद में एक आविष्कार करती हूँ
कभी हम कभी तुम तो कभी हालात बदल जाते हैं...
आकाँक्षाओं के तले हमारे जज्बात बदल जाते हैं....सहगामिनी हो जीवन-पथ की,
सहभागी एक-से स्वप्नों की,
हाँ, उसके सुरमयी स्वप्नों की
संचयिका बनना चाहता हूँ.
चर्च की ऊंची दीवारों से घिरे और
काफी अंदर तक फैले जातीय भेदभाव

मंजिल  ढूँढती हूँ 
 रास्तों के सफ़र में 
   ये बाज़ार की भीड़ है 
     मंजिल दिखेगी कहाँ ।।

'संसार में यदि सब लोग बेटियों को मरवा डालेंगे
तो ये दुनिया कैसे चलेगी, 'जानती हो हमारे देश में ही
प्रति एक हज़ार पुरुषों पर सात साढ़े सौ ही महिलायें बची हैं,


इनकी प्रथम पोस्‍ट पर आपका स्‍वागत है ...


Tuesday, May 29, 2012

# आज की हलचल बात बन गयी #

शुभप्रभात .... !!
मंगल ही मंगल हो सबका .... !! हनुमान जी की कृपा बनी रहे .... !! 

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मुझे मालूम नहीं ऐसा सपना क्यूँ आया...
कल ये ड्राफ्ट आधा छोड़ कर सोयी थी...
http://laharein.blogspot.in/2012/05/blog-post_20.html
ताला लगाने के पहले खड़े होकर सोचना...कुछ देर. फिर जाना.
Posted by Puja Upadhyay लहरें
 
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मैंने कहा क्‍या में हाई वे घोटाले पर बोल सकता हूँ ,
वे बोले , तुम सड़क छाप क्‍यों बनना चाहते हो ...........
http://www.rachanakar.org/2012/05/blog-post_4000.html
यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - मुंह बंद रखो
Posted by Ravishankar Shrivastava

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गम नहीं इसका की भरी महफ़िल रुसवा किया
उसने, गम इस बात का की वो ही तमाशाई नजर आते है ....
http://amrendra-shukla.blogspot.in/2012/05/blog-post.html
न जाने कैसे लोग बदल जाते है पर सच है, वक्त के साथ...

Posted by amrendra "amar" यादें - अमरेन्द्र शुक्ल -अमर

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अभिषेक मनु सिंघवी कांग्रेस के प्रवक्ता है ,
जो हमेशा सफ़ेद कपड़ो में चस्मा लगाये दिखाई देते है .....
http://blondmedia.blogspot.in/2012/04/blog-post_23.html
अभिसेक्स सिंघवी के मुखारबिंदु से
Posted by Alok Mohan युवा पहल

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मिथिला केर माटि मे पलल बढल
छलथि सर्वगुण सम्पन्न
http://www.vidyapati.org/2011/07/blog-post_24.html
अरिकन्चन Posted by अमित अभिनन्दन "कतेक रास बात"


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वैसे रेखा तो अदृश्य है किन्तु रेखा के उस ओर रहने वालों को
इस ओर दिखाई नहीं देता एक अपारदर्शी झिल्ली उभर आती है

http://aruncroy.blogspot.in/2012/04/blog-post_25.html
सीधी रेखा और अपारदर्शी झिल्ली Posted by अरुण चन्द्र रॉय सरोकार

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भाड़ का चना बन के देखो तो जानो ,
रेत हूँ मैं ,रेत की जलन सिर्फ मैं जानती हूँ ....  
rachanaravindra.blogspot.com/2012/05/blog-post_20.html
जलन Posted by रचना दीक्षित रचना रवीन्द्र

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क्या मैं यानि तुम यानि हम
ब्रह्मांड हैं
और तलाश है इसे पूर्णतया पाने की ?
http://lifeteacheseverything.blogspot.in/2012/05/blog-post_25.html
तलाश क्या है Posted by रश्मि प्रभा... मेरी भावनायें

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हल्की फुलकी नज़्म (?) , कविता (?)या कुछ और जो भी हो
मेरी तो बात बन गयी ,पर आपकी ?  :)

http://jomeramankahe.blogspot.in/2012/05/blog-post_24.html
बात बन गयी Posted by यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) जो मेरा मन कहे

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जीवन की इस समर भूमि में, योद्धा सुन माथे पर तेरे
कभी चिता कि राख लगेगी, कभी सजेगी कुमकुम रोली
http://paawaspoetry.blogspot.in/2012/05/blog-post_20.html
आँख मिचौली Posted by Anjani Kumar पावस

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भारतीय रेलवे की पहली रेलगाड़ी १६ अप्रैल १८५३ को बोरीबंदर ,मुंबई
(अब छत्रपति शिवाजी टर्मिनस) से ठाणे के बीच ३४ किमी चली थी
http://mukesh-lakshya.blogspot.in/2012/05/blog-post.html
भारतीय रेल के महत्वपूर्ण तथ्य Posted by मुकेश पाण्डेय चन्दन लक्ष्य


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कोई कोई ही है जो महफूज है माँ के आँचल में,
वरना अब कौन है जो उसका आँचल ओढ़ रहा है
http://kushagrakrishnan.blogspot.in/2012/05/blog-post_22.html
शहर दौड़ रहा है Posted by Kushagra संवेदना


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कूदकर उतरना तो आसान होता है
मगर उछलकर चढ़ पाना-
ज़रा मुश्किल होता है !
http://madhushaalaa-sumit.blogspot.in/2012/05/blog-post_26.html
सीढियां Posted by Madhuresh Madhushaalaa

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अब दीजिये इजाजत ..... साथ बनाए रखिये ..... फिर मिलते हैं ...............

# विभा रानी श्रीवास्तव # 


Monday, May 28, 2012

हर बात है कुछ खास

नमस्कार आज सोमवार , नयी पुरानी हलचल में आप सभी का स्वागत हैं ।

कोई तो बात होती हैं हर लफ़्ज के कहे जाने में -    कोई खास बात या कुछ और देखिये इन लिंक्स में - 
                                                        असर हो रहा है -  
                                            चिराग जोशी  कहते हैं -
                                                   असर हो रहा है 
                         तेरी आँखों में सिमटी मेरी उस तस्वीर का......
                                                         माँ..
                                           माँ -विशाल चर्चित
                                          समझ आई तो सिर्फ एक तू
                                          तेरा प्यार - तेरी ममता और 
                                         तेरे आँचल की सुहानी छाँव....
                                    

                                  पापा रहने दो नहीं समझोगे कभी ..  
                                             मनोहर चमोली
             बहरहाल आपके इस बेटे का बेटा बहुत समझदार है          
                                        वह सब कुछ समझता है
                        इतना समझदार है की रात  तब लौटता है
                                         जब रात भी सो चुकी होती है.......
                                             देखो फिर से नभ की ओर..
                                                श्यामल सुमन
                                          आग उगलता सूरज फिर भी,
                                               नित ले आता भोर।।
                                            देखो फिर से नभ की ओर।।

                                                तेरे बिना बेस्वाद जी जिन्दगी. 
                                                       विजय पाटनी 

                                      जिन्दा हूँ... खुद को भरमाये जा रहा हूँ 
                                      तेरे बिना बेस्वाद जी जिन्दगी ...खाए जा रहा हूँ 
                                   मै बस जीने की अपनी भूख, मिटायें जा रहा हूँ |.......
     और पेश है आज का गाना -


                                                     
फिर मिलूँगी  अगले सोमवार  कुछ  और  लिंक्स  के साथ  तब तक के लिए इज़ाज़त दीजिये और सुनिए ये गाना

                                                                     " दीप्ति शर्मा "


Sunday, May 27, 2012

ज़िंदगी...एक कविता...

नमस्कार! रविवार की इस हलचल मे आपका स्वागत है इन लिंक्स के साथ--



कठपुतली बन नाचते, मीरा मोहन-मोर |
दस जन, पथ पर डोलते, करके ढीली डोर ||


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ज़िंदगी...एक कविता...
जब कभी भी छलकी... किसी कोरे काग़ज़ पर..
अपने चेहरे की सारी आडी-तिरछी लकीरें खींचकर...
अपना नाम लिख जाती है...ये ज़िंदगी.....
 
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तुमने कहा मेरी प्रीत चुभती है
आँखों में मेरी  बेवफाई दिखती है
और भी न जाने वो कौन से अलफ़ाज़ थे
बुरे स्वप्न थे या तुम्हारे जीने के अंदाज़ थे
मैं सुनता रहा

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कहना चाहा बहुत कह न पाया कभी
 और फिर चैन से रह न पाया कभी 

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मैं

चंदन हूँ
आग हूँ 
सबने समझा राख
अंगार हूँ मैं



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औंधे मुँह धरती पर आता।
नाज़ुक शाखों पर जो चढ़ता,
वो जीवनभर है पछताता।

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माँ गाँव में है


न आ सका गाँव
न आ सकी माँ ही
शहर में।
और गाँव
मैं क्या करता जाकर!


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आँखों में सपने , होती कर गुजरने की आस 
पर लगता मैं बेरोजगारी की शान हूँ 
मैं एक आम इन्सान हूँ 

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वो पनीली आँखें.....

बंजर  पड़ी
ह्रदय भूमि को
जब तब
आंसुओं से सींचती,
जाने क्यों कभी
हँसती नहीं
वो नीली आँखें...


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शब्द,
स्थापित करता है
जाने-अनजाने
कितने ही सम्बन्ध
शब्द,
विच्छेदित करता है
कितने ही पुराने
किये हुए अनुबंध !.

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Black and White...

I asked her, Dear fairy
You have all magical powers
And you are so beautiful
Why you are always seen in white?

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Was it not amazing
 To see you in the toy train
Waving a flag
So excited watching
The flag in your hand
 
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where to look...!!


when you start comparing yourself with others...
when you ask question like "why me?"...
when you don't  want to understand anything or..
or you really want answers...


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और ये रहा आज का गाना --




तो आनंद लीजिये इन काव्य प्रस्तुतियों और गीत का और इजाजत दीजिये

यशवन्त माथुर को 





Saturday, May 26, 2012

शनिवारीय हलचल में आज... कुछ नई कुछ पुरानी

....माह मई.... दिन सोमवार.... दिनांक 28.... की पोस्ट की हम बड़ी बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे हैं .....चर्चाकार होंगीं.... बहन दीप्ति शर्मा जी ......स्वागत है उनका इस नई पुरानी हलचल में ........आज का पहला लिंक उन्ही को समर्पित ..... उन्ही की रचना से......


जब पहला आखर सीखा मैंने ...लिखा बड़ी ही उत्सुकता से ..हाथ पकड़ लिखना सिखलाया ओ मेरी माँ वो तू ही है............ धरोहर में बहन दीप्ति शर्मा की एक मार्मिक रचना 
 ओ मेरी माँ वो तू ही है

तुम श्रृंगार के कवि हो मुंह में कल्पना का पान दबाकर कोई रंगीन कविता थूकना चाहते हो। प्रेरणा की तलाश में टेढ़ी नज़रों से यहां-वहां झांकते हो। अखबार के चटपटे पन्‍नों पर कोई हसीन ख्वाब तलाशते हो। तुम श्रृंगार के कवि हो भूख पर, देश पर लिखना तुम्हारा काम नहीं। एक कली दो पत्तियाँ में दीपिका रानी की रचना..
 कवि और कमली.

 
मैं कल रात उन दीवानों में थी....मेरी नज़रें गुजरे ज़मानों में थी...ये दिल घबराया ऊँचे मकाँ में बड़ा...फिर सोयी मैं कच्चे मकानों में थी.... काव्य मंजूषा मे अदा जी .....
मेरी नज़रें गुजरे ज़मानों में थी...
 
तूने भरी एक आह वे जागे रात भर....वे तडपे दर्द से तू आराम से सोता ?
जिसने करी दुआ तू रहे सलामत ;......उनकी ही मौत की तू राह है जोहता . शिखा कौशिक जी.... विख्यात में


एक बार सोचो कि बिजली दफ़्तर के मज़बूर बाबू की जगह तुम होते और कोई तुम्हारे साथ ऐसा हादसा घटित करता तब.. ? भाई गिरीश मुकुल की जागरण ब्लाग "Misfit "

दहेज एक बुरी रस्म है। जिसने इसकी शुरूआत की उसने एक बड़ी बेवक़ूफ़ी की और जिसने भी सबसे पहले दहेज मांगा, उसने लालच की वजह से ही ऐसा किया। आज भी यह रस्म जारी है। एक ऐसी रस्म, जिसने लड़कियों के जीवन का नर्क बना दिया और लड़कों को आत्म सम्मान से ख़ाली एक बिकाऊ माल।
यही बिकाऊ दूल्हे वास्तव में गधे और कुत्ते से बदतर हैं। इनके कारण ही बहुत सी बहुएं जला दी जाती हैं और बहुत से कन्या भ्रूण मां के पेट में ही मार दिए जाते हैं। डॉ. अनवर जमाल खान, "हिन्दी ब्लागर्ल फोरम इन्टरनेशनल" में......

मै लिखती नहीं ...जीती हूँ  ...अपने अहसास ! ...घूँट घूँट पीती हूँ ...अपना आस-पास … मंजू शर्मा की भाव-भीनी अभिव्यक्ति.... 
रचती रही शब्दों के पुल…..

कुछ न भाये,बिन तुम्हारे...अब तो जीवन में...लो शरण में,दो दरस अब....यही चाह जीवन में ।
मन बना,मंदिर है जबसे....सूरत तेरी ही बसी...दिन-रात नवाऊं शीश अपना..चाहूँ, तुझको जीवन में ।
हर दिन पिरोऊँ पुष्प माला...अपनी चाहत की
....इन्दु रवि सिंह की हृदयानुभूति 

कुछ न भाये,बिन तुम्हारे

अँधेरे में वो झिलमिल, तुम्हारे अंगूठी के नग की थी..मैंने समझा था जैसे चांदनी कोई ठग सी थीखुशबू का एक झोंका मेरे कमरे तक आया था..शायद घर को तुम्हारा जाना न भाया थाअब भी वो महक जब तब आती है..जैसे सोये ख्वाब फिर से जगाती है ....भाई उपेन्द्र दुबे जी की प्रस्तुति  

तुम्हारा जाना....

आसक्त हो कर ....किसी के प्रति ...अकसर सोच लेते हैं लोग ..कि वो उससे ..गहन प्रेम करते हैं ...जिन एहसास से ..खुद गुज़रते हैं ...दूसरा भी वैसा ही ...महसूस करे ..ऐसे अरमान ..उनके मन में पलते हैं ,................  संगीता दीदी..  "गीत-मेरी अनुभूतियाँ " में
तथा कथित प्रेम...

जेठ कि तपती है..जब दुपहरी ....कहीं झिर झिर..कुछ झरता है ..बिन बदरा भी बरसता है .....पारदर्शी कर्मरत  मन ,...लिए झीने आवरण ,दिनचर्या ..शुश्रुशण...!!....अनु दीदी
 

चल मन ....लौट चलें अपने गाँव .....!!
 
बहुत हुआ अब छोड़ भी दे, मन तृष्णा की डोर से बंधी आस की मृगी को मुक्त कर बंधन से मृगमरीचिका में भटकती इस व्याकुल उलझन को अब छोड़ भी दे, मन कहाँ,...... शालिनी जी की.... अनुभूति
अब छोड़ भी दे, मन

कहते हैं कि पानी का इतिहास सभ्यताओं का इतिहास है, इस बहते पानी ने कितना कुछ देखा होता है, कितना कुछ सहा होता है। यही कारण रहा होगा कि स्वर्गीय भूपेन हजारिका गंगा को समाज में व्याप्त विद्रूपताओं के लिये उलाहना देते हैं, गंगा बहती हो क्यों? नदियाँ हमारे इतिहास की साक्षी हैं, पर इनका भी अपना कोई इतिहास है, यह एक अत्यन्त रोचक विषय है...........भाई प्रवीण पाण्डेय जी की सार्थक सोच
पानी का इतिहास

यादों की कस्तूरी कैसे छुपाऊँ ज़ेहन में बसी याद कैसे मिटाऊँ जीवन के वो पल कैसे भुलाऊँ जहाँ सफ़र का पहला कदम पड़ा जहाँ रूह को इक जीवन मिला टिमटिमाता दिया बुझने की कगार पर है आ सहेज लूं पलों को रौशनी के कतरे सा कौन जाये दिल्ली की गलियाँ छोड़कर मगर परदेसियों को तो इक दिन है
वन्दना जी......... ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र में........
बाबुल मेरो नैहर छूटो ही जाये

*फिर आज पुरानी डायरी के, * *पन्ने पलट रही हूँ..* *इन पन्नो के साथ,* *मैं जिन्दगी के गुजरे* *लम्हों को पलट रही हूँ...* *मेरी ख्वाइशों की तरह,* *मेरी डायरी भी जिम्मेदारियों के, बोझ तले दबी थी कही....* * * *मैं खुद को छोड़ कर आगे बढ़ती तो रही,* *पर हर मोड़ पर डायरी में बंद खुद को ढूढती रही..सुषमा जी 'आहुति' में......
मेरी डायरी..... !!!

छूटा माँ का साथ बहन की होगी मजबूरी तू तो मेरा अपना है मन है तुझे देखने का कुछ अंतिम बातें करने का रीत गईं साँसे बिसरा ना बचपन देर न करना कहीं भूल न जाना मुझसे मिलने जल्दी आना यही लिखा था ना तुमने कांपती कमजोर उँगलियों से पास आती मौत के साथ दिखता था..............संध्या शर्मा......... मैं और मेरी कवितायेँ... में

खत... संध्या शर्मा


मन तो करता है छु लूँ उसको हाँथ बढ़ा कर,.........पर टूट न जाए ये सपना, लगता है इसका डर ......

मोहनिश कटियार ...............

जन्नत आती है नजर....

अक्सर हम सभी दूसरो पर...कविता लिखते है.....पर क्या कभी किसी ने अपने आप पर लिखी है कविता
खुद को बांधा है शब्‍दों के दायरे में स्वावलोकन कर रहे हैं भाई संजय भास्कर जी... आदत..मुस्कुराने की..
आज हर इन्सान यहाँ, लाश बन गया है क्यों ? रिश्तों की जगह पैसा, एहसास बन गया है क्यों ?? तेज रफ्तारों ने यहाँ, छीनी है कई जिन्दगियाँ... लिखते हैं सुनील गुप्ता 'श्वेत'....हिन्दी साहित्य काव्य संकलन में ...
और अब माँगती हूँ विदा....पर मिलूँगी अगले महीने बारिश के फुहारों के साथ..... सुनिये ये गीत...

 


Friday, May 25, 2012

पेट्रोलियम-पदार्थों की खपत कम करने के 5 उपाय

नमस्कार! शुक्रवार की हलचल मे आपका स्वागत है कुछ खास लिंक्स के साथ---



रात की चादर पे
तारों की फुलकारी
देख देख
हँसता रहा चाँद
पीता रहा चांदनी के घूँट  !


हाँ, इसी धरती पर छाएँगी अभी हरियालियाँ
हौसला बरसात की बौछार तक लेकर चलो।

गीत क्या लिक्खें कोई जब...
घर गए मालिक के लेने
स्वयं लुट कर आ गए
सुदामा के चावलों को संतरी  ही खा गए



कसक सी उठती है सीने मैं, जब भी तुम्हारी याद आये
भीग जाती हैं पलके, जब भी तुम्हारी याद आये



आज सपने गीले-गीले हैं,
दुख की पैंठ सपनों तक पहुँच
चुकी है,
बे-मौसम की बारिश
मेरे आसुओं को धोने मे प्रयासरत है।



मैंने  तो  बस  यूँ  ही  तुमसे  पूछ  लिया  था
आँधियों  में  सोच  का  दिया  जला  लिया  था



झुलसते से पेड़ खड़े हो जाते   , आई जेठ की दुपहरी

पंछी भी निश्वास  हो जाते , आई जेठ की दुपहरी

आसमान से मनो बरस रहे हो, आग के गोले

ताप इतना है, कि लगे सूर्य अनलकोष होले



खाद बना पाया खुद को
महीनों तक जब सड़ा है
.
कल सर उठाएगा बीज
आज धरती में गड़ा है



एक तरफ ब्लॉग पोस्ट पर लोग बात करते हैं बुज़ुर्गों को सम्मान देने की, वृद्ध आश्रम जैसी संस्थाओं को कम करने का प्रयास करने की ताकि लोगों के दिलों में अपने घर के बुज़ुर्गों के प्रति सम्मान जाग सके। वह उनके महत्व को समझ सकें, उनको अपने पास रख सकें, वगैरा-वगैरा लेकिन कोई यह बताये जब बुज़ुर्ग ही ऐसी शर्मनाक हरकतें करने लगे तो फिर क्या किया जाये।


हम पुस्तकों से कटते जा रहे हैं, यह सही है किन्तु यही कारण है कि हम अधिक उच्छृंखल होते जा रहे हैं। हम अपनी अस्मिता खोते जा रहे हैं। हमें पुनः पुस्तकों से जुड़ना होगा क्योंकि वही हमारा संस्कार कर सकती हैं


यह नई श्रृंखला हैं भारत के उत्तर में स्थित हिमाचल प्रदेश के  मनाली, रोहतांग और मणिकरण के सफ़र की । यह यात्रा अपने परिवार सहित जून, 2010 में आगरा से दिल्ली तक बस से तथा दिल्ली से मनाली, रोहतांग और मणिकरण होते हुए और वापिस दिल्ली तक कार के माध्यम से की थी ।


मगर इन उपायों को अपनाने के लिए एक ऐसी शक्तिकी जरुरत है, जिसे देश की जनता ने पिछले 65 वर्षों में किसी भी सरकार में नहीं देखा है। जी हाँ, मैंइच्छाशक्तिकी बात कर रहा हूँ।



नामवर जी की सतत अध्ययनशीलता और नयी से नयी चीजों के प्रति व्यापक जिज्ञासा व ग्राह्यता का ही कमाल है कि वह हमेशा स्वयं में भरतेरहते हैं। लगातार देतेहुए भी कभी खालीहोते नहीं दिखे। अफसोस कि उस दौरान कुछ व्यक्तिगत अस्त-व्यस्तता के कारण उनका वह व्याख्यान मैं रिकार्ड न कर सका।



छह जून 2012 वाला शुक्र पारगमन 2004   के बाद 8 वर्ष वाला है और 2012 के बाद  उक्त घटना के लिए   105 साल का इंतजार  करना होगा।
वर्तमान पीढ़ी के लिए यह आखरी शुक्र पारगमन होगा।
कि इस घटना के वक्त पृथ्वी से देखने पर शुक्र सूर्य के सामने से धीमी रफ्तार में क्रिकेट की गेंद के आकार में गुजरता दिखाई देगा।



"तुम्हारी आँख तो ठीक है ना?"
"हाँ।"
"फिर आँसू क्यों?"
कोई उत्तर नहीं।
"रो रहे हो?"
कोई उत्तर नहीं।

वह उठकर जाकर दूसरी आँख को देखती है। धारा वहाँ से भी बह रही थी।



उस ज़माने में सियालकोट का एक प्रसिद्ध साहित्यिक व्यक्तित्व अल्लामा इक़बाल का था जिनकी नज़्मों को बड़े शौक से सभाओं में गाया और पढ़ा जाता था. वहाँ एक प्राथमिक विद्यालय भी था जिसमें मैं पढ़ता था. वहाँ मुशायरे भी होते थे, यह मेरे स्कूल की शिक्षा के अंतिम दिन थे.



कितनी ही वेबसाइट्स हैं जो आपको ऑनलाइन होकर कंप्यूटर के जरिये किसी मोबाइल फ़ोन पर एस एम एस भेजने की सुविधा देती हैं । पर एक नया और बेहतर तरीका भी है एस एम एस भेजने का ।


ड़ायबीटिज से ग्रसित होने पर ही व्यक्ति को पता चल पाता है कि वह रोग की चपेट में आ गया। डॉक्टर द्वारा शुगर लेबल बढा हुआ बताने पर वह चिंता ग्रस्त हो जाता है तथा मधुमेह को सहज स्वीकार नहीं करता। जैसे उसकी दिनचर्या चलती है उसी पर कायम रहता है।



वह बिना पटरियों का पुल है, जिस पर धडधडाते हुए स्टीम इंजन वाली एक  ट्रेन गुज़रती है. जलते हुए कोयले की गंध वातावरण में चिपकी रह जाती है. कुछ चिपचिपाहटें पानी की रगड़ से भी नहीं धुलतीं.


I feel happy being with you each and every moment,, Even at times in crowd... i feel joy when your rhythm beats in my heart. At times of cloudy days


Growing day by day

In the garden of love

Watered by you

That is why

I am your shadow


I want love and respect
I demand equality and rights
I beg for a life without fear


To change the mood
n change the look.
Untie those intricate knots
and search
for chains to unhook.

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और ये रहा आज का गाना -