नमस्कार! गुरुवार की हलचल यूं तो संगीता आंटी की होती है लेकिन फिलहाल कुछ समय तक वो व्यस्त हैं इसलिए हाजिर हूँ मैं ही एक बार फिर कुछ चुने हुए लिंक्स के साथ --
बेपरवाह होकर देखो कभी जिंदगी को
झटक दो उन चिंताओं को
सिर को हिलाकर कभी
मुस्करा दो कभी यूँ ही बेतकल्लुफ़ हो
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मानवीय संवेदनाओं के निम्नतर स्तर की उपज हैं ये घटनाएँ ......और इन्हें उच्चतर बनने की क्रिया एक सतत प्रक्रिया है ...........इसके लिए प्रयास होता रहे चाहे वो लिखने और पढ़ने से ही क्यों ना हो ..तो लगा ये ज्यादा अच्छा है .... कुछ ना होने से बहुत बेहतर ...........
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That broken glass
scattered all around me
hurting my fingers
as I bend to pick up the shards.
इसी के साथ दीजिये इजाजत;मिलेंगे कल फिर.....
ये '' उदासी ''......
क्यूँ अपने रंग में रंग कर मुझे......
उदास.....बहुत उदास... कर जाती है........???
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क्यूँ अपने रंग में रंग कर मुझे......
उदास.....बहुत उदास... कर जाती है........???
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बेपरवाह होकर देखो कभी जिंदगी को
झटक दो उन चिंताओं को
सिर को हिलाकर कभी
मुस्करा दो कभी यूँ ही बेतकल्लुफ़ हो
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कूकती कोयल के स्वर से गूँजती अमराइयों में
प्यार के थे गीत गाती, गर्मियों की वो दुपहरी
बिन तेरे उफ़! किस कदर थी जानलेवा यार लम्बी
और सन्नाटे में डूबी, गर्मियों की वो दुपहरी
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जेठ हुआ मेहमान
चढी धूप तपने लगा भडभूजे का भाड ।
चित्त चना सा भुन रहा,तन हो रहा तिहाड ।
दिन भर चूल्हे पर तपे धरती तवा समान ।
रोटी सेके दुपहरी,जेठ हुआ मेहमान ।
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भावनाओं में बहोगे तो पागलों सा लिखोगे....
आज यहाँ हो रही है बारिश हल्की हल्की, पर खाली दिल भारी सा है,
सोच रहा था थम जाती बूंदें घूम आता कहीं से पर बादलों का बरसना जारी है..
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मेरी नजरें हो रही धुंधली साफ़ तस्वीर बना,
मेरी नजरों से उनके चेहरे की चमक ले आ!
दिल का शोला जख्मो की आग ठंडी है,
उनके गर्म आहों की तू दहक ले आ
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मै और वो ...
क्राइम पेट्रोल
बच्चे कितना दर्द सह रहे हैं | किसी का बाप उन्हें प्रताड़ित कर रहा है तो कुछ शिक्षकों का जुल्म, भारत देश का ऐसा कितना बड़ा भाग है जहाँ बच्चों को पैदा करते ही या तो भीख मांग कर कमाई करने के लिए छोड़ दिया जाता है या कहीं कवाड़ी की दूकान में कबाड़ा बीनने के लिए
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अभिनय की तरह
चढी धूप तपने लगा भडभूजे का भाड ।
चित्त चना सा भुन रहा,तन हो रहा तिहाड ।
दिन भर चूल्हे पर तपे धरती तवा समान ।
रोटी सेके दुपहरी,जेठ हुआ मेहमान ।
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भावनाओं में बहोगे तो पागलों सा लिखोगे....
आज यहाँ हो रही है बारिश हल्की हल्की, पर खाली दिल भारी सा है,
सोच रहा था थम जाती बूंदें घूम आता कहीं से पर बादलों का बरसना जारी है..
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मेरी नजरें हो रही धुंधली साफ़ तस्वीर बना,
मेरी नजरों से उनके चेहरे की चमक ले आ!
दिल का शोला जख्मो की आग ठंडी है,
उनके गर्म आहों की तू दहक ले आ
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मै और वो ...
मै गीत पुराने गाती थी
वो मुझ पर गीत बनाता था
मै बच्चो के संग खेलती थी
वो टोलियाँ ढून्ढ के लाता था
मै तितली सी इठलाती थी
वो मुझे देख मुस्काता था
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क्राइम पेट्रोल
बच्चे कितना दर्द सह रहे हैं | किसी का बाप उन्हें प्रताड़ित कर रहा है तो कुछ शिक्षकों का जुल्म, भारत देश का ऐसा कितना बड़ा भाग है जहाँ बच्चों को पैदा करते ही या तो भीख मांग कर कमाई करने के लिए छोड़ दिया जाता है या कहीं कवाड़ी की दूकान में कबाड़ा बीनने के लिए
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अभिनय की तरह
हम तड़पते हैं और चीख़ नहीं पाते !
कोई भी कर सकता है हमारी मदद
पर, हम, पु का र ते नहीं !
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टिटलागढ़ की एक रात
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सुबह की चुस्की
लिखना नहीं, दिखना बन्द हो गया था
हमारे फेसबुक से मुँह मोड़ लेने के कारण वे न चाहते हुये भी हमसे मुँह मोड़ चुके थे। समझ मे तब स्पष्ट आया कि फेसबुक अकेले ही १०० के लगभग पाठक निगल चुका है।पर इस बार ट्विटर की चूँ चूँ भी साथ में रहेगी हमारे। जब दिखना है तो ढंग से और हर रंग से दिखा जायेगा।
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टिटलागढ़ की एक रात
उधर से बॉस की खरखराती हुई आवाज आई , " राजेश , तुम आज के आज ही टिटलागढ़ में जाकर वहां के स्टील प्लांट में परचेस ऑफिसर से मिलो . मैं फैक्स भेज रहा हूँ सारी डिटेल्स उसी में है . "
मैंने मिमियाते हुए कहा , " सर बहुत काम है , अगले हफ्ते चले जाऊं ? ♦♦♦♦♦
सुबह की चुस्की
आगे बढ़
और नए रास्तो से
आज कर पहचान
लिख गीत ऐसे
कि कल पंछी
उसी गीत से
करे सुबह का आव्हान
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समय : क्या है समय ?
दूसरा बनवास
धरम क्या उनका है, क्या ज़ात है, ये जानता कौन?
घर न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन,
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अभिषेक ठाकुर की कवितायेँ
खुद को भिगो देने के लिए
या एक बिना रील के कैमरे
से ली गयी कुछ अकेली तसवीरें
और अंत में बच जाएगा
सिर्फ एक मौन
टेबल लैम्प की
आवाज की तरह
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समय : क्या है समय ?
- समय क्या है ?
- समय का निर्माण कैसे होता है ?
- गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से समय धीमा कैसे हो जाता है ?
- गति मे समय धीमा क्यों हो जाता है ?
- क्या समय एक आयाम है ?
दूसरा बनवास
धरम क्या उनका है, क्या ज़ात है, ये जानता कौन?
घर न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन,
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अभिषेक ठाकुर की कवितायेँ
खुद को भिगो देने के लिए
या एक बिना रील के कैमरे
से ली गयी कुछ अकेली तसवीरें
और अंत में बच जाएगा
सिर्फ एक मौन
टेबल लैम्प की
आवाज की तरह
लिखना नहीं, दिखना बन्द हो गया था
हमारे फेसबुक से मुँह मोड़ लेने के कारण वे न चाहते हुये भी हमसे मुँह मोड़ चुके थे। समझ मे तब स्पष्ट आया कि फेसबुक अकेले ही १०० के लगभग पाठक निगल चुका है।पर इस बार ट्विटर की चूँ चूँ भी साथ में रहेगी हमारे। जब दिखना है तो ढंग से और हर रंग से दिखा जायेगा।
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That broken glass
scattered all around me
hurting my fingers
as I bend to pick up the shards.
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और ये रहा आज का गाना ---
यशवन्त माथुर

