"अप्रेल" का नाम आते होटों पर हंसी आ जाती .... मन सोचने लगता है ... किसे हमलोग मूर्ख बनाए ... कोई हमें मूर्ख न बना दे ,चौकने भी रहते है .... अत: ... किसी के द्वारा मूर्ख बना दिए जाने पर बुरा नहीं मानना चाहिए ..... ?? आपने किसे-किसे "अप्रेल-फूल" बनाया.... ? आप लोगों को पता है .... मुझे जलेबी बहुत पसंद है .... एक बार मेरी पड़ोसन की बेटी एक ढंका डोंगा लेकर आई और बोली मेरी माँ आपके लिए जलेबी भेजी है .... सुबह का समय और गर्म-गर्म जलेबी ..... न कुछ सोची न समझी और डोंगा लेकर जलेबी खाने टूटी लेकिन डोंगा खोलते उसमे से मिटटी के बड़े-बड़े लड्डू निकले और मैं मूर्ख बनी ..... "1अप्रेल" जो था.... हाँ हाँ हाँ हाँ ......
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http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/#%21/2012/03/blog-post.html
प्रेम संबंधों के शुरूआती चरण में इसका स्तर विधाई भूमिका निभाता है .आकर्षण की प्रबलता और टिकाउपन का पैमाना बनता है
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http://ekprayas-vandana.blogspot.in/2011/04/blog-post_21.html
अहंकार के दो बच्चे
" मैं " और " मेरा "
खूब फ़ुले फ़ले
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http://sada-srijan.blogspot.in/2009/05/blog-post_23.html
सपने देखना किसे अच्छा नहीं लगता, सबकी आंखों में कोई न कोई सपना बसा होता है, हां ये बात जरूर है कि सबके सपने पूरे नहीं हो पाते लेकिन फिर भी लोग सपने देखना बन्द तो नहीं कर देते,
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http://mylifescan.blogspot.in/2010/12/blog-post.html
मैं संग तेरे चलूंगी तेरा साया बन रहूंगी पर,
तेरे गुमान ने बेतरतीबी से ठुकराया है मुझे |
जीते जी मैंने खुद को मिट्टी बना डाला था,
तेरे भरोसे पे ऐतबार ने मिटा डाला था मुझे
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http://jazbaattheemotions.blogspot.in/2010/12/blog-post.html
कुछ तो मुर्दापरस्ती का दस्तूर था
यूँ भी हर कोई रस्मो से मजबूर था
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http://punamsinhajgd.blogspot.in/2011/04/blog-post.html
बस ....
एक आत्मसम्मान बाकी है
उस दामन में जो नितांत मेरा है
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http://swarnakshar.blogspot.in/2011/04/blog-post.html
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बहुत ज़्यादा लिंक्स जो आपके पढ़ने की खुराक हो,जुटा नहीं पा रही हूँ,अफसोस है ,लेकिन मेरी मजबूरी है की मैं आपका साथ छोडना भी नहीं चाहती।
विभा रानी श्रीवास्तव
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प्रेम संबंधों के शुरूआती चरण में इसका स्तर विधाई भूमिका निभाता है .आकर्षण की प्रबलता और टिकाउपन का पैमाना बनता है
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अहंकार के दो बच्चे
" मैं " और " मेरा "
खूब फ़ुले फ़ले
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सपने देखना किसे अच्छा नहीं लगता, सबकी आंखों में कोई न कोई सपना बसा होता है, हां ये बात जरूर है कि सबके सपने पूरे नहीं हो पाते लेकिन फिर भी लोग सपने देखना बन्द तो नहीं कर देते,
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मैं संग तेरे चलूंगी तेरा साया बन रहूंगी पर,
तेरे गुमान ने बेतरतीबी से ठुकराया है मुझे |
जीते जी मैंने खुद को मिट्टी बना डाला था,
तेरे भरोसे पे ऐतबार ने मिटा डाला था मुझे
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कुछ तो मुर्दापरस्ती का दस्तूर था
यूँ भी हर कोई रस्मो से मजबूर था
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बस ....
एक आत्मसम्मान बाकी है
उस दामन में जो नितांत मेरा है
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ये सुन्दर वायुमंडल और साथ में ऐसी काया| हरित, श्यामला तल और नीला नभ ये कैसे पाया.
बड़े प्रेम से धरती बोली जिसने मुझको रचा है| जो सर्जन करता है सबका ये भी उसका रचा है.
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बहुत ज़्यादा लिंक्स जो आपके पढ़ने की खुराक हो,जुटा नहीं पा रही हूँ,अफसोस है ,लेकिन मेरी मजबूरी है की मैं आपका साथ छोडना भी नहीं चाहती।
विभा रानी श्रीवास्तव
NICE
ReplyDeleteएक और अच्छी प्रस्तुति |
ReplyDeleteध्यान दिलाती पोस्ट |
सुन्दर प्रस्तुति...बधाई
दिनेश पारीक
मेरी एक नई मेरा बचपन
http://vangaydinesh.blogspot.in/
http://dineshpareek19.blogspot.in/
सुन्दर हलचल ...
ReplyDeleteबहुत बढ़िया सुंदर हलचल,....
ReplyDeleteMY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: मै तेरा घर बसाने आई हूँ...
सुन्दर लिंक्स ………बढिया हलचल
ReplyDeleteजो भी और जितने जुटाए हैं ,
ReplyDeleteलिंक्स सुन्दर जुटाए हैं आपने ,गुणवत्ता लिए आयें हैं ,सबका मन लुभाएँ हैं .
बहुत बढिया हलचल
ReplyDelete…आभार
शुक्रिया विभा जी जज़्बात की पोस्ट को यहाँ जगह देने का ।
ReplyDeleteबढ़िया हलचल....
ReplyDeleteसादर आभार।
वाह ...बहुत खूब ।
ReplyDeleteअच्छी हलचल ... कोशिश रहेगी सब लिंक्स पर हाज़री लगाने की ... धन्यवाद ... !!
ReplyDeleteसुन्दर लगी यह हलचल... और यहाँ खुद को पा कर और भी अच्छा लगा... आपका शुक्रिया
ReplyDeleteबहुत अच्छे लिंक्स दिये हैं आंटी!
ReplyDeleteसादर
बढ़िया प्रस्तुति
ReplyDeleteबहुत सही लिखा है।
ReplyDeleteक्या कहने
ReplyDeleteबहुत सुंदर हलचल