सुप्रभात!
सच कहूँ मुझे सीधी-सच्ची बात कहने में कभी संकोच नही होता। और सीधी-सच्ची बात यह है कि मुझे सीधी-साधी हलचल में मज़ा ही नही आ रहा। यह भी कोई बात हुई कि हलचल हो मगर आवाज़ ही न आये। मज़ा तो तब है जब हलचल हो ऎसी की हिलाकर रख दे...
तो दोस्तों इजाजत चाहूँगी कुछ ऎसी खट्टी-मीठी बातों के साथ हलचल हो जाये जो आपकी सुबह हँसी के फ़व्वारों और गरमा-गरम ब्रेकफ़ास्ट के साथ खुशनुमा बना जाये।
टिप्पणी अवश्य दें आप कैसी हलचल चाहते हैं?
चर्चा पर चर्चा फ़िर एक चर्चा, क्या करें भई चंडीदत्त शुक्ल जी की कवितायें ही लाजवाब हैं।
गहन चिंतन में डूबी हैं वन्दना जी चलिये हम रूबऊ होते है वंदना जी की तीन कविताओं से,
दोस्तों सच हमेशा कड़ुआ होता है। और इसी सच के चाथ हम पढ़ेंगे श्याम कोरी जी की कविता,” मै दलाल नही हूँ ।
लीजिये पढिये प्रतिभा जी की आत्म-विश्वास से भरी यह कविता।
बहुत कुछ लिखते हैं जनाब क्या आपने भी कभी पढ़ा है इन्हे--- मुकेश सिन्हा की यह खूबसूरत कविता।
गज़ल पढ़ने का समय हुआ और लीजिये प्रस्तुत है लक्ष्मी शंकर वाजपेयी जी की यह गज़ल।
आरम्भ से होना चाहिये था आरम्भ लेकिन क्या करें संजीव जी व्यस्त हैं “उड़ने को बेताब है यह नया मेहमान।“
कृपया माफ़ी दें समय बहुत कम है आज की चर्चा बस यहीं समाप्त करती हूँ। अब दीजिये इजाजत सुनीता शानू को अगले रविवार होगी फ़िर नई खुशबूदार हलचल आपकी फ़रमाइश पर।
सब लोगां नूँ घणी घणी राम-राम।