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| मोर का नर्तन |
सुप्रभात! दोस्तों आज मै लेकर आई हूँ, नई पुरानी हलचल में काव्यमयी कुछ खट्टी, कुछ मीठी हलचल। हो सकता है, आज भी आपके चिट्ठों के साथ कुछ छुपमछुपाई की जाये...:)
आओ करें मिलकर चर्चा,सबकी बारी-बारी
रहे सलामत चिट्ठा-चर्चा, और ये चिट्ठाकारी॥
बिखरे मोती पिरो कर माला क्यूँ न बनायें,
माला में गूँथे मोती पे नाम तेरा लिख जायें,
आज मेरा दिन है, बोली थी एक दिन वो,
नही डरेगी, डटी रहेगी आज भारतीय नारी,
आओ करें मिलकर चर्चा,सबकी बारी-बारी
रहे सलामत चिट्ठा-चर्चा, और ये चिट्ठाकारी॥
राहें जो अंजानी सी थी, मुझको ढूँढनी होगी,
जिंदगी एक खामोश सफ़र है सुननी होंगी,
वीणा के सुर में लिपटे,गीत सुन रहा हूँ मै,
मेरे गीत गुनगुनायेगी, आज ये दुनिया सारी,
आओ करें मिलकर चर्चा,सबकी बारी-बारी
रहे सलामत चिट्ठा-चर्चा, और ये चिट्ठाकारी॥
मै इक निर्जल सागर यूँही ही बहता जाऊँ,
बस इक ज़िद है मेरी, तुझको साथ ले जाऊँ,
मोर का नर्तन कहाँ गया, बतला स्वप्न मेरे,
लिखा था मैने जिस पल प्रथम प्रेम पत्र एक बारी,
आओ करें मिलकर चर्चा,सबकी बारी-बारी
रहे सलामत चिट्ठा-चर्चा, और ये चिट्ठाकारी॥
चोर बहुत हैं, लेकिन एक चोर पकड़ में आया
मेरी ही रचना से जिसने अपना ब्लॉग सजाया,
हाय टिप्पणी!! काहे टिप्पणी!! के चक्कर में,
ब्लॉग पोस्ट के चोरों की कैसे गई मतिमारी,
आओ करें मिलकर चर्चा,सबकी बारी-बारी
रहे सलामत चिट्ठा-चर्चा, और ये चिट्ठाकारी॥
आ सखी चुगली करें, कोई चाहे न चाहे
वसुधैव कुटुम्बकम बने जिंदगी की राहें
पिता के बाद भी, ढूँढ रही दो जोड़ी आँखें
मेरी अम्मा के गाँव में ठहरती है वों जाके
कोई करे बातें मीठी कोई खट्टी कोई खारी
आओ करें मिलकर चर्चा,सबकी बारी-बारी
रहे सलामत चिट्ठा-चर्चा, और ये चिट्ठाकारी॥
अंत में इजाजत दीजिये सुनीता शानू को...फ़िर मिलेंगे अगले हफ़्ते आज ही के दिन...
शुभकामनायें... आपका दिन मंगलमय हो...।
सुनीता शानू



