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| मोर तो राजस्थानी है जी अब कहाँ ठहरा हुआ है बताया नही |
नमस्कार..सुप्रभात!
मित्रों,
मेरी सुबह तो रात दो बजे ही हो जाती है जब आप सो रहे हैं नींद में और मै आपके ब्लॉग पर जाकर आपकी नई पुरानी रचनाओं को पढ़ने और हलचल मचाने में लगी होती हूँ...
आज फिर सुबह की इस खुशनुमा रंगीन हलचल में मै सुनीता शानू आप सभी का स्वागत करती हूँ।
कुछ समय से एक बात का सांझा करना चाहती थी। क्या आप सबने भी रिश्तों के बदलने की चुभन महसूस की है कभी? क्यों वक्त के साथ हर रिश्ता बदल जाता है। जबकि कहते हैं प्यार कभी कम नही होता। मै मेरा और तू तेरा की भावना का जन्म क्यों होता है।
ऎसे ही कई सवालों से घिरी है मगर अनजान है दुनिया के बदलाव से, नादान है जो समझती है सबको अपना सा, फ़िर भी छुईमुई सी मुस्कुराती फ़िर आ गई है...लीजिये आज की हलचल...
ऎसे ही कई सवालों से घिरी है मगर अनजान है दुनिया के बदलाव से, नादान है जो समझती है सबको अपना सा, फ़िर भी छुईमुई सी मुस्कुराती फ़िर आ गई है...लीजिये आज की हलचल...
मानव मेहता
का भी यही कहना है कि मौसम संग बदलते हैं रिश्ते। हाँ शायद रिश्तों की महक भी मौसम के साथ बदलती रहती है।
का भी यही कहना है कि मौसम संग बदलते हैं रिश्ते। हाँ शायद रिश्तों की महक भी मौसम के साथ बदलती रहती है।एक ही रिश्ता है माता-पिता का संतान से जो कभी बदलता नही।बाकि सभी समय के साथ बदल जाते हैं।
अंजु चौधरी
जी को पढ़े तो रिश्तों के बदलाव का एक पहलू नजर आयेगा। पढिये बदलते रिश्ते पर उनकी यह कविता।
जी को पढ़े तो रिश्तों के बदलाव का एक पहलू नजर आयेगा। पढिये बदलते रिश्ते पर उनकी यह कविता।कभी-कभी मुझे लगता है पेड़ से सूखे पत्ते की तरह तमाम रिश्ते-नाते साथ छोड़ जाते हैं।
महिराज ब्लॉग पर मंजुकुमारी जी ने बदलते रिश्तों पर क्या लिखा है आप खुद ही पढिये...
जिंदगी भर यदि दुखों का रोना रोया जाये तो मुझे लगता है ज़िंदगी बहुत छोटी पड़ जायेगी। हम चाहते नही फ़िर भी दुख क्यों आते हैं ज़िंदगी में यही सवाल कर रहे हैं
नरहरी पटेल अब आप ही बताईये कौन चाहेगा दुखों को बुलाना?
नरहरी पटेल अब आप ही बताईये कौन चाहेगा दुखों को बुलाना?कविता वर्मा
जी कहती हैं दुखवा कासे कहूँ ? कविता जी यहाँ-वहाँ कहने से दुख कभी कम नही होने वाला। मेरी माने तो खुद से अच्छा कोई दोस्त नही है यकीन नही तो यशवन्त माथुर
जी से पूछ लें वो लिखते हैं...बातें खुद से...
जी से पूछ लें वो लिखते हैं...बातें खुद से...सचमुच खुद से अच्छा दोस्त कोई नही। जब भी कभी कुछ कहना हो खुद से बातें की जायें। जब अपनी बातें हो अपने जज्बात हों खुद से शिकायतें कितनी खूबसूरत लगती हैं आईये चलते हैं चंदन जी
के ब्लॉग पर जनाब लिखते हैं अब अपनी शर्तों पर बिकता हूँ मै।
आज बहुत दिन बाद मुझे मेरी सहेली बहुत याद आ रही है। किया भी क्या जाये?
सही है प्यार महसूस किया जाता है और मुझे लगता है प्यार खुद के भीतर होता है। यदि किसी को चाहते हैं तो पहले खुद से प्यार किया जाये J
तुम फुसफुसाई
पागल हो?
समझते ही नही
मै तुमसे प्यार करती हूँ... कितनी खूबसूरत मनमोहक कविता है चण्डीदत्त शुक्ल
जी की... आप भी महसूस कीजिये ठण्डी हथेली में मुसकान की गुनगुनाहट
जी की... आप भी महसूस कीजिये ठण्डी हथेली में मुसकान की गुनगुनाहटफ़िर मिलेंगे शायद इस शनीवार न मिल पायें हम क्योंकि मुझे जाना होगा। एक हॉस्य कवि सम्मेलन में पच्चीस दिसम्बर की शाम पिलानी में हास्य कविताओं के साथ। लेकिन वादा है लौटते ही मिलेंगे आप, मै और.....वही चाय और क्या... J
आपका दिन मंगलमय हो...
सादर
सुनीता शानू



Sunder Links Liye Halchal.... Abhar
ReplyDeleteBeautiful Halchal... Beautiful Links...:)
ReplyDeleteनए लिंक्स खोज लायीं हैं आप ..कवि सम्मलेन के लिए बधाई और शुभकामनायें
ReplyDeleteअच्छी लिंक्स अच्छी हलचल |
ReplyDeleteआशा
पढ़ने को बहुत सामग्री मिल गयी।
ReplyDeleteलेकिन वादा है लौटते ही मिलेंगे आप, मै और.....वही चाय और क्या...
ReplyDeleteहम तो आपके लौटने का इंतजार करेंगें सुनीता जी.
आपकी प्यारी बातें ज्यादा अच्छी लगतीं हैं,
'लिंक्स' तो फिर खुद ही अच्छे हो जाते हैं जी.
सोचता हूँ समय मिलने पर पढ़ ही लूँ.
प्रश्न पूछ कर आप जाते हैं कहाँ ?
ReplyDeleteमोर मोरनी कहाँ ठहरे हैं,आप ही दीजिये न बता.
कवि सम्मलेन के लिए अग्रिम बधाई और शुभकामनायें………सुन्दर लिंक संयोजन्।
ReplyDeleteअच्छे सूत्र.... सुन्दर हलचल....
ReplyDeleteकवि सम्मलेन कि लिये अग्रिम शुभकामनाएं
सादर...
rishaton par achchhe links ke liye shukriya...kavisammelan ke liye shubhkamnayen.
ReplyDeleteगजब की हलचल है।
ReplyDeleteकवि सम्मेलन अपनी प्रस्तुति रिकॉर्ड करवा लीजिएगा....हमे देखनी है :)
सादर
सुनीता जी,...आज आपने बहुत अच्छे सुंदर लिंक्स खोजकर हलचल में प्रस्तुत किया,!!!!!!!!बधाई
ReplyDeleteमेरी नई पोस्ट की चंद लाइनें पेश है....
सब कुछ जनता जान गई ,इनके कर्म उजागर है
चुल्लू भर जनता के हिस्से,इनके हिस्से सागर है,
छल का सूरज डूबेगा , नई रौशनी आयेगी
अंधियारे बाटें है तुमने, जनता सबक सिखायेगी,
पूरी रचना पढ़ने के लिए काव्यान्जलि मे click करे
अरे वाह सुनीता जी, आपका भी अपना ही अंदाज़ है इस नई-पुरानी हलचल का... बहुत दिनों बाद आपसे गुफ्तुगू हो पाई इस माध्यम से...
ReplyDeleteहां जी मोर तो राजस्थानी ही है !
ReplyDeletebadhia rahi halchal ...
ReplyDeletebade hi khoobsurat dhang se aapne links pesh kiya hai.
ReplyDeletessneh abhinandan
Prritiy
शानदार और प्रभावशाली प्रस्तुति
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