नमस्कार एवं शुभप्रभात...
सारा देश आज गर्मी में झुलस रहा है, पर आप की रचनाएं पढ़कर शीतलता मिल जाती है...
पेश है आप की प्यारी रचनाओं के लिंक...
हम न भूल पाएंगे...शारदा अरोड़ा
एक वो लोग उतरे हैं नज्मों में , जो धूप में सुखाते हैं
दूसरे वो जो , घनी छाँव से दिल को भाते हैं हज़रात
कहाँ गयी केशर क्यारी?" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
कहाँ गयी सोने की चिड़िया,
भरने दूषित-दूर उड़ाने?
कौन ले गया छीन हमारे,
अधरों की मीठी मुस्काने?
आई भोर...सुमन
अब तो जागो मन
श्वेत परिधान पहन कर स्वागत करने,
बडे सवेरे आई भोर !
मशीनी मानव...राजेश कुमारी
एक मशीनी कल पुर्जों की तरह
दुनिया से बेखबर अपने उद्यम में
संलग्न हैं वे दोनों
मशीनी मानव
पूर्ण समर्पण मेरा था ....मुदिता
रोका था तुमने फिर दृढ़ता से ,
खुद के यूँ बहते जाने को ,
हो लिए पृथक उन लहरों से
जो आतुर थी तुम्हें समाने को
पथराई आँखें...संजय भासकर।
बूढी पथराई आँखें
एक टक त़कती
सूनी राहों को
जहाँ फैला है
सूनापन
इनकी खाली
जिंदगी सा
जो था नहीं.....(कुँवर जी
जो था नहीं,
जो रहेगा नहीं,
वो ही रह कर भला क्या हो जायेगा !
ज़िन्दगी की खोज
न करना खुद को कमज़ोर, मंजिल होगी आगे खड़ी
सफ़र भी करना तय ऐसे, याद आये हर घडी
इंसान वही है जिसने, तक़दीर अपने हाथों से लिखी,
वह तो बुत है जिसको किस्मत अपनी लकीरों में दिखी,
कितनी भला कटुता लिखें(गजल) कल्पना रामाणी
पशु कहें, किन्नर कहें, या दुष्ट दानव घृष्टतम,
फर्क उनको क्या भला, जो नाम, जो ओहदा लिखें।
पापियों के बोझ से, फटती नहीं अब ये धरा
खोद कब्रें, कर दफन, कोरा कफन टुकड़ा लिखें।
सवाल...यशवंत माथुर
सवाल घुमड़ रहा है
उमड़ रहा है
कई दिनों से मेरे मन में
सवाल को ही पता नहीं
कि सवाल का जड़ मूल क्या है
बाबूजी शुभ स्वप्न किसी से कहियो मत ...[..एक लघु कथा
मैंने आज सुबह सूर्योदय
में एक खास सपना देखा है कि मैं राष्ट्रपति भवन में प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहा हूँ और पता है ये सपना मैंने सुबह सुबह देखा है
बचालो बेटियां...
प्रसन्न वदन चतुर्वेदी
डरी-सहमी सी रहती है, नहीं ये कुछ भी कहती है,
मगर बेटों से ज्यादा पूरे अपने फर्ज़ करती है,
बढ़ाती वंश जो दुनियां में उसको मारना फिर क्या ?
बचा लो बेटियाँ अपनी, पड़ेगा तड़पना फिर क्या ?
तो जीने का मज़ा क्या है.... Bhoopendra Jaysawal
थम जाती है साँसे हर रोज हजारों के, कुछ लोग होते है जनाजे के लिए
अपनी मैय्यत पर लाखो को रुलाया नहीं, तो जीने का मज़ा क्या है ?
आज की हलचल में बस इतना ही...कल महान महाप्रयाण की बुद्ध पूर्णिमा है यानी कि भगवान बुद्ध का जन्म दिन...
आप सब को इस महान पर्व पर मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाएं।
धन्यवाद
चलते चलते मेरी पसंद का ये गीत आप के लिए
आज की ये फुर्तीली पोस्ट आनन-फानन में बनाई गई है कुछ...... कुछ हो गया है एक नया मोड दे. मेरे हमनशीं कहानियों को, तू अब एक नया मोड दे. अब बात तेरी मर्ज़ी पे, प्यार दे या मुझे छोड़ दे . कब इख्तेयार में है मेरे, तुझे चाहना न चाहना, तू चाहे दवा ए दर्द दे, चाहे तो दिल को तोड़ दे. जितना भी असबाब है तन में समाता है ‘नवीन’ जो समंदर है, उसे दरिया समझ बैठे थे हम खुद में खुद को पाने की लालसा खुद में खुद को पाने की तलाश उस सुख को पाने का भ्रम या तो पहुंचा देता है मन को ऊँचाइयों में या कर देता है दिग्भ्रमित खुशियों से नही अदावत मेरी बस ग़मों से रिश्ता पुराना है आज मुस्कराहट है मेरे चेहरे पर कि आज फिर मौसम सुहाना है दूर -दूर तक नज़र न आए मंज़र क्यों बहारों के जहाँ भी देखो बैनर -पोस्टर केवल ठेकेदारों के ! रंग-बिरंगे चैनल भी अब हाल चाल क्या बतलाएं नारों में रंगी दीवार लगते चेहरे हैं अखबारों के ! दिल लगे तब दुःख होता है दुःख होता है तो तू रोता है जो रोता है तो चैन से सोता है सोता है तो सपनो में खोता है आईना तो हर किसी को उतार लेता है अपने अन्दर मगर उतरा हर कोई आईने में कहाँ निकाल पाता है खुद को उस आईने के अन्दर से बस कैद हुआ रह जाता है मानो आईने के मोहपाश में सारी रात की जागी आंखों ने भोर के उजाले में अपनी पलकें बंद की ही थी.......... कि तभी कानों में आवाज आई...... मेरा नाम पुकार रहे थे तुम...... मगर...नहीं था कोई... सादर..... भाई यशवन्त को किसी वजह से देर हो गई सो आज यशोदा ही सही यश से दोनों नाम प्रारम्भ होता है